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Kabir Ke dohe » संत कबीर के 30 दोहे अर्थ सहित जानियें।

नमस्कार मित्रों, स्वागत है आप सब का मेरे ब्लॉग चेला गुरूजी में। वैसे तो मैंने इस ब्लॉग पर बहुत सी अच्छी जानकारियाँ दी है लेकिन आज की जानकारी का कुछ विशेष महत्व है।

आज इस आर्टिकल में हम संत Kabir Ke dohe के बारे में जानेंगे वो भी अर्थ सहित। संत कबीर ने अपने सम्पूर्ण जीवन में बहुत से दोहो की रचना की है उन्ही में से कुछ महत्वपूर्ण संदेश वाले दोहे आज हम जानेंगे।

कबीर के दोहे » Kabir Ke dohe

कबीर के दोहे सम्पूर्ण संसार में विख्यात है। महान कवियों में से एक यह भी थे। कवि कबीर के दोहे के बारे में जानने से पहले संत कबीर के जीवन की जानकारी भी आवश्यक है।

संत कबीर का जन्म 1398 ई. में हुआ था यह पहले समाज सुधारक बाद में कवि बने थे। कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण शाखा के ज्ञानाश्रयी उपशाखा के प्रवर्तक थे। संत कबीर के समय कागज व कलम नहीं थे।

लेकिन उनके शिष्य धर्मदास से उनके प्रत्येक दोहे का संकलन किया है। इनकी रचनाएँ साखी, सबद व रमैनी है जिनके समूह को बीजक कहा जाता है। 1518 में कवि इस संसार से मुक्त होकर स्वर्ग की ओर चले गए।

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।

कबीर के दोहे

(1)

ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी भाषा का प्रयोग करना चाहिए जो सुनने वाले के मन को बहुत अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

(2)

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।

जो मन देखा आपना, मुझ से बुरा न कोय।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मैं सारा जीवन दूसरों की बुराइयां देखने में लगा रहा लेकिन जब मैंने खुद अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई इंसान नहीं है। मैं ही सबसे स्वार्थी और बुरा हूँ भावार्थात हम लोग दूसरों की बुराइयां बहुत देखते हैं लेकिन अगर आप खुद के अंदर झाँक कर देखें तो पाएंगे कि हमसे बुरा कोई इंसान नहीं है।

(3)

माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।

भावार्थ: जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिटटी को रौंद रहा था, तो मिटटी कुम्हार से कहती है – तू मुझे रौंद रहा है, एक दिन ऐसा आएगा जब तू इसी मिटटी में विलीन हो जायेगा और मैं तुझे रौंदूंगी।

(4)

धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा !

(5)

पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात।

देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान की इच्छाएं एक पानी के बुलबुले के समान हैं जो पल भर में बनती हैं और पल भर में खत्म। जिस दिन आपको सच्चे गुरु के दर्शन होंगे उस दिन ये सब मोह माया और सारा अंधकार छिप जायेगा।

(6)

बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर।

पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि खजूर का पेड़ बेशक बहुत बड़ा होता है लेकिन ना तो वो किसी को छाया देता है और फल भी बहुत दूरऊँचाई  पे लगता है। इसी तरह अगर आप किसी का भला नहीं कर पा रहे तो ऐसे बड़े होने से भी कोई फायदा नहीं है।

(7)

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब । 
पल में प्रलय होएगी,बहुरि करेगा कब ॥ 

भावार्थ: कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और जो आज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !

(8)

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये।

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।

भावार्थ: चलती चक्की को देखकर कबीर दास जी के आँसू निकल आते हैं और वो कहते हैं कि चक्की के  पाटों के बीच में कुछ साबुत नहीं बचता।

(9)

दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय ॥ 

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि दुःख के समय सभी भगवान् को याद करते हैं पर सुख में कोई नहीं करता। यदि सुख में भी भगवान् को याद किया जाए तो दुःख हो ही क्यों ?

(10)

अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप, 
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।

अर्थ :- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।

(11)

साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।

इस संसार में ऐसे सज्जनों की जरूरत है जैसे अनाज साफ़ करने वाला सूप होता है। जो सार्थक को बचा लेंगे और निरर्थक को उड़ा देंगे

(12)

शीलवंत सबसे बड़ा सब रतनन की खान।
तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन।

भावार्थ: शांत और शीलता सबसे बड़ा गुण है और ये दुनिया के सभी रत्नों से महंगा रत्न है। जिसके पास शीलता है उसके पास मानों तीनों लोकों की संपत्ति है।

(13)

कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं ।
पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं ॥ 

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं. सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं |

(14)

माखी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाए ।
हाथ मेल और सर धुनें, लालच बुरी बलाय

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि मक्खी पहले तो गुड़ से लिपटी रहती है। अपने सारे पंख और मुंह गुड़ से चिपका लेती है लेकिन जब उड़ने प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती तब उसे अफ़सोस होता है। ठीक वैसे ही इंसान भी सांसारिक सुखों में लिपटा रहता है और अंत समय में अफ़सोस होता है।

(15)

मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग।

तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग ॥ 

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला और कपट से भरा है। उससे तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है

(16)

पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत।

अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि बीता समय निकल गया, आपने ना ही कोई परोपकार किया और नाही ईश्वर का ध्यान किया। अब पछताने से क्या होता है, जब चिड़िया चुग गयी खेत।

(17)

माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या फेरो।

(18)

जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ,
मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ।

भावार्थ: जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।

(19)

प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय।

लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय।

भावार्थ: जिसको ईश्वर प्रेम और भक्ति का प्रेम पाना है उसे अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा को त्यागना होगा। लालची इंसान अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा तो त्याग नहीं सकता लेकिन प्रेम पाने की उम्मीद रखता है।

(20)

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये।

दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए।

भावार्थ: चलती चक्की को देखकर कबीर दास जी के आँसू निकल आते हैं और वो कहते हैं कि चक्की के  पाटों के बीच में कुछ साबुत नहीं बचता।

(21)

बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि,
हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह  ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।

(22)

संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत 
चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत।

भावार्थ: सज्जन को चाहे करोड़ों दुष्ट पुरुष मिलें फिर भी वह अपने भले स्वभाव को नहीं छोड़ता। चन्दन के पेड़ से सांप लिपटे रहते हैं, पर वह अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।

(23)

ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग।

तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सको तो ढूढ लो।

(24)

जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान।

जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं जिस इंसान अंदर दूसरों के प्रति प्रेम की भावना नहीं है वो इंसान पशु के समान है।

(25)

कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ। 
जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।

(26)

कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय। 
सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय।

भावार्थ: कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा

(27)

जाती न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान।

भावार्थ: साधु से उसकी जाति मत पूछो बल्कि उनसे ज्ञान की बातें करिये, उनसे ज्ञान लीजिए। मोल करना है तो तलवार का करो म्यान को पड़ी रहने दो।

(28)

तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय।

सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए।

भावार्थ: कबीर दास जी कहते हैं कि लोग रोजाना अपने शरीर को साफ़ करते हैं लेकिन मन को कोई साफ़ नहीं करता। जो इंसान अपने मन को भी साफ़ करता है वही सच्चा इंसान कहलाने लायक है।

(29)

माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर। 
आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।

 भावार्थ: कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

(30)

पाछे दिन पाछे गए हरी से किया न हेत । 
अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत ।।

देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।

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bharat kumar bhargav

मैं भरत कुमार भार्गव इस ब्लॉग पर एजुकेशन से सम्बंधित आर्टिकल लिखता हूँ, आपको मेरे द्वारा शेयर की गयी जानकारी अच्छी लगे तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर जरुर करे साथ ही Notification on करे। जिससे हर पोस्ट की जानकारी आपको मिलती रहे।

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